चीटीं का आत्मबोध
उद्देश्य
इस कहानी का मुख्य उद्देश्य बच्चों को यह बताना है कि हमें हमेशा बड़ों की बात माननी चाहिए। हो सकता है कि उनकी कोई बात हमें अच्छी न लगे।पर वह आगे आने वाली परेशानियों को समझते हैं।हमें उन परेशानियों से बचाने के लिए ही वह हमें मना करते हैं।
कहानी
एक घने से जंगल के पास, एक बड़ा सा पहाड़ था। जब उगते हुए सूरज की किरणें पहाड़ पर पड़ती थीं तो उसे देख कर ऐसा लगता था कि पहाड सोने का है।
जंगल के सभी जानवर उस पहाड़ को रोज देखते थे और सोचते थे कि काश हम इस पहाड़ पर चढ़ पाते और जा कर देखते कि वहाँ से जंगल कैसा दिखता है।
चूँकि पहाड़ बहुत ऊँचा था, इसलिए कोई भी जानवर पहाड़ पर चढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था।
जो चढ़ने का प्रयास करता भी था, वह थोड़ा ऊपर चढ़ कर, वापस लौट आता था।

जंगल के बीचों बीच चींटियों का एक परिवार रहता था। परिवार में तीन सदस्य थे। पापा-चींटी, मम्मा-चींटी और बेबी चींटी। पापा-चींटी और मम्मा-चींटी, बेबी चींटी को बहुत प्यार करते थे। वह जिस चीज की फरमाइश करती, वह उसे ला कर देते थे। वह उसकी हर बात सुनते थे। वह जैसा कहती थी, वैसा करते थे।
एक दिन, बेबी चींटी, सुबह, बहुत जल्दी जग गई। वह अपने घर से बाहर आई तो उसे सामने सोने सा चमकता पहाड़ दिखाई पड़ा। पहाड़ देख कर, उसका मन करने लगा कि वह पहाड़ की चोटी तक जाए और पापा मम्मी के साथ पिकनिक मनाए।
वह घर के अंदर आई और बोली, ‘‘मम्मी मुझे पहाड़ पर ले चलो। हम सब वहाँ पिकनिक मनाएँगे। खेलेंगे, खाएंगे और खूब मौज करेंगे।’’
बेबी चींटी की बात सुन कर मम्मी बोलीं, हम लोग वहाँ नहीं जा सकते। वहाँ आज तक कोई जानवर नहीं गया है। हम ऐसी जगह कैसे जाएँगे? इतनी देर में पापा भी आ गए। उन्हें देख कर बेबी चींटी उनसे भी कहने लगी कि उसे पहाड़ी पर जाना है। पापा ने भी उससे वही बात कही।
लेकिन बार-बार जिद करने पर पापा-चींटी ने कहा कि अच्छा कल सुबह जल्दी उठ जाना। हम तीनों लोग कल पहाड़ी पर चलेंगे।
यह सुनते ही, बेबी चींटी की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने जल्दी-जल्दी सारी तैयारियाँ कर लीं और शाम को जल्दी सो गई।
सुबह उठकर तीनों पहाड़ पर चढ़ने के लिए चल दिए। रास्ते में पापा-चींटी का दोस्त खरगोश मिला। उसने पूछा आप सब कहाँ जा रहे हैं। तो पापा चींटी ने उसे सारी बात बताई।
खरगोश उनकी बात सुन कर खुश हो गया। पापा-चींटी ने उससे पूछा कि क्या तुम भी हमारे साथ पिकनिक पर चलना चाहोगे? हम सब मिलकर वहाँ खाये, पिऐंगे, खेलेंगे, खूब मजे करेंगे।
उनकी बात सुन कर खरगोश का भी मन करने लगा कि वह भी इन लोगों के साथ पिकनिक पर जाए। लेकिन फिर उसने सोचा कि चींटियाँ तो बहुत धीरे-धीरे चलती हैं और वह बहुत तेज भागता है। दोनों की स्पीड में ताल-मेल नहीं बैठ पाएगा। इनके साथ धीरे-धीरे चलते हुए वह बोर हो जाएगा।
खरगोश ने सोचा कि क्यों न इन्हें चलने दिया जाए। मैं एक दो घंटे बाद पीछे से पहुँच जाऊँगा। इस तरह मैं पहाड़ चढ़ने में बोर भी नहीं होऊँगा और इनके साथ पिकनिक का मजा भी ले लूंगा।
तीनों चींटियाँ, खरगोश की बात सुन कर खुश हो गईं। बोलीं कि ‘‘हम ऊपर तुम्हारा इंतजार करेंगे। जल्दी आना’’।
यह कह कर तीनों चींटियाँ पहाड़ पर चढ़ने लगीं और खरगोश गाजर तोड़ने खेतों में चला गया।
अभी वह लोग थोड़ी ही दूर गये थे कि बेबी चींटी कहने लगी, ‘‘मैं थक गई पापा। मुझे गोदी लो ’’। पापा-चींटी ने उसे समझाया कि अभी तो बहुत चढ़ाई चढ़नी है। अपने आप चलो, आग देखेंगे।
कुछ दूर चल कर, बेबी चींटी फिर ज़िद करने लगी कि मुझे गोदी लो, गोदी लो।
मम्मी चींटी ने बेबी चींटी को गोदी लेने की कोशिश की लेकिन वह भारी थी। वह उसे उठा नहीं पाई।
पापा-मम्मी ने उसे समझाया कि वह लोग इसी चढ़ाई के कारण नहीं आना चाहते थे। उसने ज़िद की, इसी लिए वह आए हैं। इतने थकाऊ सफर में हमें गोदी लेने की हिम्मत नहीं है। अत: बेबी-चींटी को खुद ही चलना पड़ेगा।
उसके बाद बेबी चींटी कुछ दूर तो आगे चली, लेकिन फिर थकान के कारण रोने लगी।
उसे रोता देख कर मम्मी पापा को भी घबराहट होने लगी कि अब क्या किया जाए?
उन्होंने जब निगाह घुमाकर पीछे देखा तो उनकी साँस में साँस आई। पीछे खरगोश दौड़ता आ रहा था। जैसे ही वह उनके पास पहुँचा तो उसने देखा कि बेबी चींटी रो रही है। थकान के मारे वह बेहाल है। उससे चला नहीं जा रहा है।
खरगोश ने बेबी चींटी को उठाकर, अपनी पीठ पर बैठा लिया, और तेजी से पहाड़ की चोटी की तरफ दौड़ने लगा।
ठंडी हवा लगने से बेबी चींटी पर मस्ती सवार हो गई। पहले तो वह बड़ी देर तक हुर्रे-हुर्रे चिल्लाती रही और फिर गाना गाने लगी।
बेबी चींटी की मस्ती देखकर खरगोश को भी मजा आने लगा और वह तेजी से दौड़ने लगा।
दौड़ते-दौड़ते जब खरगोश भी थक गया तो वह रुक गया।
जैसे ही वह रुका, बेबी चींटी को हवा लगना बंद हो गई। जैसे ही हवा लगना बंद हुई तो उसने अगल बगल निगाह दौड़ाई। मम्मी पापा को आस-पास न देख कर वह घबरा गई।
वह अपने मम्मी पापा से कभी अलग नहीं हुई थी। पापा के दोस्त खरगोश को वह जानती भी नहीं थी। वह अपने आपको अकेला पाकर डर गई।
वह जोर-जोर से रोने लगी। वह मम्मी, मम्मी, पापा, पापा चिल्लाने लगी। उसने खरगोश से कहा, मुझे मम्मी पापा चाहिए। मुझे उनके पास ले चलिए। मैं उनके बिना नहीं रह सकती हूँ। उनसे दूर आकर मुझे डर लग रहा है। मुझे उनके पास जाना है।
खरगोश ने उसकी बात मान ली। वह पीछे मुड़ा और तेजी से दौडने लगा।
लौटते हुए उसे खरगोश की सवारी में बिल्कुल मजा नहीं आ रहा था। वह उसकी पीठ पर बैठी-बैठी सोच रही थी कि उसने कितनी बड़ी गलती करी। पापा मम्मी का कहना नहीं माना।
पापा मम्मी से अलग होकर वह समझ गई कि हमें हमेशा बड़ों की बात माननी चाहिए।
हो सकता है कि उनकी कोई बात हमें अच्छी न लगे। पर वह आगे आने वाली परेशानियों को समझते हैं। हमें उन परेशानियों से बचाने के लिए ही वह हमें मना करते हैं। वरना तो हमारी खुशी में ही उनकी खुशी होती है।
जरा ही देर में खरगोश, पापा मम्मी के पास पहुँच गया। बेबी चींटी, खरगोश की पीठ से उतरी और पापा के गले लग गई।

गले लगकर उसकी आँख में आँसू आ गए और वह बोली, ‘‘ पापा खरगोश अंकल बहुत अच्छे हैं। उन्होंने मुझे पहाड़ों की सैर कराते-कराते सिखा दिया कि आप दोनों बहुत अच्छे हो, मुझे बहुत प्यार करते हो। मैं आपके बिना नहीं रह सकती’’।
इसके बाद खरगोश ने तीनों को अपनी पीठ पर बैठाया और चारों लोग पिकनिक मनाने चल पड़े।
Well done!
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